नई शिक्षा नीति का देश को बेसब्री से इंतजार था। बुद्धिजीवियों का मानना था कि नई शिक्षा नीति से निजी स्कूलों पर लगाम लगेगी और सरकारी स्कूल को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देकर और गुणवत्तापरक बनाया जाएगा, लेकिन प्रथमदृष्टया इसे देखने से यही लगता है कि इसका अनुपालन कैसे होगा? जीडीपी का दस फीसद हम साठ के दशक में ख़र्च करते थे अब छह फीसद खर्च करेंगे। इसके लिए सरकार की प्रतिबद्धता नहीं है। भला राज्य छह फीसद क्यों खर्च करें ? ऐसे में कानून बनाकर इसे बाध्य किया जाना चाहिए। इससे शिक्षा क्षेत्र की बजटीय व्यवस्था मजबूत रहेगी। इससे सभी परियोजनाएं प्रभावी होंगी। इसके बाद प्री प्राइमरी की तो बात की गई है लेकिन उसे आंगनबाड़ी पर छोड़ दिया गया है। दोनों मर्ज करने से व्यवस्था नहीं बनेगी। सरकारी स्कूलों को मजबूत और भरोसेमंद बनाने पर फोकस नहीं है। इससे निजी स्कूलों कालेजों का दबदबा बढ़ेगा। उनकी और भी मनमानी अभिभावकों को सहनी पड़ेगी। सरकार क्यों नहीं समझ सकी निजीकरण के तमाम जतन के बाद भी हमारे आइआइटी, आइआइएम, एम्स के मुकाबले एक भी खड़े नहीं हो पा रहे हैं।
इस नई शिक्षा नीति से उम्मीद थी कि बोर्ड परीक्षाओं को समाप्त करेगी लेकिन उससे मुक्ति नहीं मिल सकी। नियमित टेस्ट और एसेसमेंट के आधार पर रिजल्ट सबसे बेहतर है। किसी का सिर्फ तीन घंटे की परीक्षा से मूल्यांकन सही नहीं होगा। बोर्ड परीक्षा के पैटर्न को अब तमाम देशों में आउटडेटेड कर दिया गया है। विशेषज्ञता वाले शैक्षिक संस्थानों को यथावत काम करने देना चाहिए उनसे यह अपेक्षा न की जाए वह दूसरे इतर क्षेत्र के शिक्षण का भी कार्य करें।
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